Showing posts with label बुकस. Show all posts
Showing posts with label बुकस. Show all posts

Sunday, June 10, 2012

नमक का दरोगा - मुंशप्रेमचंद

प्रेमचंदजी ने दर्शाया है की नेक इरादों का अंजाम अच्छा ही होता है.  एक नौजवान जब नौकरी की तलाश करता है तो पिता अपनी जिंदगी के तजुर्बे से नसीहत देते हैं. कहते हैं ऐसी नौकरी ढूंढना जिसमे उपरकी आमदनी अधिक से अधिक हो. आखिर महीने की तनख्वा में घर गृहस्ती के खर्चे चलाने होते हैं. कुछ अपनी इच्छाएँ पूरी करनी हो तो ऊपर की आमदनी आवश्यक हो जाती है.

आज्ञाकारी बेटे ने नमक विभाग में नौकरी तो हासिल कर ली मगर झूट की राह पर चलना उसे कुछ रास न आया. बल्कि बेटे ने कुशलता से व्यव्हार करके एवं अच्छे बर्ताव द्वारा नाम कमा लिया.  एक दिन उसका पाला गाँव के बहुत बड़े व्यापारी से पड़ा जो अक्सार घूसखोरी का सहारा लेकर अपना काम करवाता था. मगर नए दारोगा थे इमानदार लाख समझाने पर भी माने नहीं और परिणाम स्वरुप उनपर कचहरी का झूठाही मामला दर्ज हो गया. नौकरी भी चली गयी. पिता, पत्नी सभी लड़के की इमानदारी का फल देखकर उसपर नाराज थे माताजी भी अपनी यात्रा की कामनाएँ पूरी नहीं कर पा रही थी.

लेकिन एक सप्ताह बाद अचानक व्यापारी स्वयंही पूर्व दारोगा के द्वार पर आ खड़े हुए. उनके मन में लड़के की कठोर धर्मनिष्ठा के प्रति आदर जाग उठा. वह अपना सौभाग्य समझने लगे थे की इसे व्यक्ति से उनकी गाँठ पड़ी और उसीको व्यप्पारी ने अपना मनेजर बनाने की ठान ली. पूरे आदर के साथ उन्हूने दारोगा को अच्छी तनख्वा देकर नौकरी पर रखा.

अच्छी नीयत से किये कर्त्तव्य का फल कुछ देर बाद ही सही लेकिन मीठा ही मिलता है.


Sunday, May 6, 2012

मोटारामजी शास्त्री - मुंशी प्रेमचंद

मोटारामजी विद्यावान शिक्षक थे एवं धन के अभाव में चिन्त्रग्रस्त थे। उन्होंने उपाय खोजा गलत रास्ते पर चलने का। धूर्तता से वैद बनकर लोगों को ठगने की योजना बनाते हुए वे पत्नी को स्पष्ट करते हैं की इस मार्ग से  बहुत धन मिलेगा और खतरा भी न होगा। नकली आयुर्वेदिक दवाइयों में घास पूस मिलाकर किसी की मौत न होगी परंतु जब रोगी अपने आप दो चार दिनों में ठीक होजाए तो उनकी वैदिकी के गुण गाएगा। इस प्रकार लाभ  होंगे पर नुक्सान कभी नहीं यही कहते हुए मोटारामजी ने अपनी बुद्धि का बखान पत्नी के सामने किया।

अर्थात उन्होंने अखबारों में झूठे इश्तेहार दिए और विदेशी लोगों से झूठे प्रमाण पत्रों का भी विज्ञापन किया। कुछ अरसे तक अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करते रहे और सफल नामी वैद्य बन गए। मगर कहानी का अंजाम अपेक्षा के अनुसार बुरा ही हुआ। उनकी बनी बनाई ग्रहस्ती और प्रतिष्ठा एक ही शाम में चकना चूर हो गयी जब एक अमीर महीला की मर्हम्मद करने के ढोंग में वे रंगे हाथों पकडे गए। मुश्टणदोन ने उनकी खूब पिटाई करके उन्हें लखनऊ से हमेशा के लिए विदा कर दिया।

पंडितजी धाम से जमीन पर आ गिरे और प्रेमचंदजी ने इस प्रकार फिर एक बार सरल एवं महत्वपूर्ण सीख एक छोटी सी कहानी के जरिये दे डाली।  

Sunday, April 8, 2012

प्रेरणा - मुंशी प्रेमचंद

प्रेमचंदजी की सुन्दर लघुकथाओं में से यह एक श्रेष्ठ कथा है। एक  शिक्षक किस तरह भौतिक जीवन से दूर जाकर विद्या देने की प्रक्रिया में अपने मूल्यों की खोज करते हैं। वहीँ दूसरी ओर उनकी कक्षा का सबसे शैतान बच्चा  सूर्यप्रकाश  जिम्मेदारी का बोज सरपर पड़ते ही अपनी इज्जत और जिंदगी को संवारने में कामयाब हो जाता है।

पाठशाला के नियमों का उल्लंघन करने मे तथा शिक्षकों को उल्टा डराने में सूर्यप्रकाश माहेर था। मगर जब उसका छोटा ममेरा भाई मोहन साथ रहने लगा तो भाई के भरोसे ने सूर्यप्रकाश के चाल चलन में आसानी से परिवर्तन कर दिखलाया। उसके निःसन्देह प्रेम और आदर से सूर्यप्रकाश मजबूर होता है। शैतानी बंद कर सुलझे हुए जिम्मेदार आदर्शों का पालन करने लगता है। पढ़ लिखकर कलेक्टर बन जाता है और जिंदगी के एक मोड़ पर अपने उसी पुराने शिक्षक के समक्ष एक छोटे से गाँव में खड़ा होता है, फिर मुलाकात पुरानी यादों को ताजा करती है। किन्तु इस बदलाव में एक शिकार होता है उसका छोटा भाई जो सूर्यप्रकाश को रिझाने के मक्साद में अत्याधिक श्रम उठाकर बीमारी में चल बस्ता है। अपनी आहुति से सूर्यप्रकाश को संवारता है।

दूसरी ओर शिक्षक राह में आए उप्युक्तियों से खूब उन्नति करते हैं और नाम कमाते हैं। परन्तु सामाजिक कार्यों में अक्सर अछे से अच्छे लोग राजनीति और छाल कपट का शिकार होते हैं। योग्यता के बावजूद भाग्य साथ नहीं देता। ऐसी ही निराशाजनक परिस्थितियों एवं पत्नी की मौत के कारण वे सब कुछ छोड़ कर उसी गाँव में पढ़ाना शुरू करते हैं। गाँव के मासूम बच्चों को पढ़ाकर, नैसर्गिक सौंदर्य की आड़ में दुबारा सुख शान्ति अनुभव करते हैं। अबकी बार जब उनकी सूर्यप्रकाश से मुलाकात होती हिया तब दोनों की विचार धरा और जीवन मूल्यों में ठीक विपरीत फर्क आ गया है। सूर्यप्रकाश सामाजिक मूल्यों और रीतियों के अनुशासन को जान गया है वहीँ शिक्षक व्यक्तिगत आजादी और स्वतन्त्र विचारों का महत्व भी अनुभव से पहचान गए हैं।

अयोग्य शिक्षकों के चलते शिक्षा प्रणाली पर बड़ा बुरा असर पड़ता है। इस विषय पर भी कुछ अमूल्य मायने प्रेमचंदजी ने स्पष्ट किये हैं।




Sunday, March 4, 2012

दो सखियाँ – मुंशी प्रेमचंद


यह कहानी पढने में आसान रही और सन १९२५ के ज़माने की पद्धतियों और विचारों पर प्रकाश डालती रही.

दो बचपन की सहेलियां हैं पदमा और चंदा जो पत्रों के द्वारा संपर्क में रहती हैं और दिल खोलकर एक दुसरे को अपने जीवन के बारें में बतलाती हैं. उनके पत्र व्यवहार में उनके विपरीत व्यक्तित्वों की पहेचान होती है और जिसके कारण उनकी जिंदगियों के रास्ते अलग अलग दिशाएं लेती हैं. प्रेमचंदजी ने सरल भाषा में लघु कहानी  के माध्यम से माध्यम वर्गीय जीवन पर टिपण्णी की है 

पदमा है स्वतंत्र, स्वाभिमानी रूपवान सम्पन्न घराने की युवती. उसने अपने जीवन साथी विनोद का चुनाव स्वयं किया. विनोद ज्ञानी और विद्वान् हैं. वे स्त्रियों को अधिकार देने के हक़ में हैं, देश विदेश में पर्यटन करने की वजह से उनकी बातों में अनोखापन है जो पदमा को शुरू में भांता है. किन्तु धीरे धीरे पत्रों में बढती शिकायतों से  समझ  में आता है की शादी के बाद पदमा के ख़याल बदलते हैं. घर संसार चलाने में उसको विनोद की अधिक सहायता  की उम्मीद होती  है और सभी सांसारिक झमेलों से वह परेशान होती है. तब वह अफ़सोस जताती है के विनोद व्यवहारिक, सांसारिक, प्रपंची नहीं, धनवान नहीं. वह मुह से बोलती नहीं मगर उसके बर्ताव से  उदासीनता और नाराजी झलकती है. वह मन ही मन दूसरों की दुनियादारी से या रूमानी आचरण से तुलना कर विनोद को कोसती है. विनोद सारी बातें समझकर मन में दबाए रखते हैं और अंत में उनको पदमा की नाराजगी असह्य होती है, और इसी तरह दोनों का सम्बन्ध बिगड़ता है और संसार बिखरता  है.

ठीक विपरीत कहानी है चंदा की. रूपवती होने के साथ साथ चंदा कर्तव्यशील  है. वह परम्पराओं से प्रभावित है और  सेवा भाव उसके अन्दर कूट कूट के भरा है. अपने पिता के चुने हुए वर से वह विवाह करती है और उनको शादी  के बाद देखने के अवसर को ताकती है. विवाह पश्चात वह उन्ही को अपना सर्वस्व मानती है और पारिवारिक  झगड़ों  के बावजूद सभी को जोड़ने में लग जाती है. ससुराल वालों की सेवा को ही अपना धर्म समझती है. सांस और  ननदें  बोहोत कड़क, कठोर होने के कारण शुरू में उसकी बोहोत दुर्दशा होती है. परन्तु अपने  मन  की शक्ति से वह पति का अटूट प्यार और सहारा पाने में सफल रहती है. उनके सभी परिवार वालों का दिल  जीत लेती है और उसकी इस्सी तपस्या के मीठे फल में  कहानी की सीख मिलती है.

इन पत्रों में कुछ आधुनिक ख्यालों को पढ़कर अचरज होता है तो वहीँ इस बात पर भी आशचर्य होता है की  पति पत्नी एक दुसरे से मन की बात बोहोत कम बोलते थे. बात को स्पष्ट करने के बजाय उस समय में बात को   समझ लेने पर ही मानो जोर दिया जाता हो. इसके अलावा मन में यह प्रशन उठता है की क्या  सब त्यागकर  हमेशा अंत में मीठा ही फल मिलता है? क्या अंत तक प्रतीक्षा करने से अधिकतम समय असफलता में नहीं  कटता? इस प्रकार का आचाराण क्या इसी  वजह से सही होता  है की सदियों से  ऐसा ही चलता आ रहा है? 

शायद सहनशीलता और उदारता की सीमाएं और साथ ही में अभिव्यक्ति और अपेक्षा की भी सीमाएं सदैव नए  सिले से तय करने में कोई बुराई नहीं. अपने निजी जीवन में इन्ही सीमाओं को पेहेचानकर सफलता का  प्रयास करना जरूरी है. सेवा और सुधार दोनों अच्छे गुणों का आचरण संतुलित जीवन के लिए एक साथ ही संभव है 




Sunday, February 5, 2012

बिराज बहु - शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

चट्टोपाध्यायजी के कई उपन्यास प्रसिद्ध हैं जैसे देवदास, पारिनीता जिनपर बनी फ़िल्में भी हमने देखि हैं.


बिराज बहु पढने में बेहद मजा आया क्योंकि इसमें पतिप्रेम का अमूल्य महत्व जीवन का मार्गदर्शन करता है.  बिराज एक स्वाभिमानी अतिसुन्दर स्त्री है जो अंत में पतिप्रेम को ही सबसे महत्व पूर्ण मानती है. इससे अधिक आनंद और समाधान हुआ बिराज के पति नीलाम्बर के शांतचित, दार्शनिक एवं स्नेहपूर्ण वृत्ति को जानकार. अपनी धर्मं पत्नी के प्रति नीलाम्बर के गहरे प्रेम और उन दोनों के बीच का अटूट रिश्ता इस संपूर्ण कहानी के दूखाद वृत्तान्त पर भारी हो गया और मेरे मन में एक सकारात्मक प्रभाव छोड़ गया. 


नीलाम्बर और बिराज का बाल विवाह हुआ और अब बिराज की आयु लगभग बीस वर्ष है जब कहानी शुरू होती है. सर्व गृहिणियों की तरह ही वह घर के काम काज करती है, पति की सेहत को लेकर चिंतित रहती है और अन्य स्त्रियों की तरह टंटे कर घर सर पर भी उठा लेती है. सांस के गुजर जाने से वाही बड़ी बहु है जो नीलाम्बर की छोटी बहन नन्ही हरिमति को भी पाल पोसकर बड़ा करती है. नीलाम्बर के भाई पीताम्बर दुनियादारी खूब जानते है, कचहरी से रोजगार कमाकर धीरे धीरे अपनी गृहस्ती अलग करते हैं; बटवारे की मांग करके करीब होकर भी  भाई से दूर ही रहेते हैं. 


उनकी दुनियादारी के ठीक विपरीत नीलाम्बर का कोमल स्वबहाव और निश्चिन्त सदैव संतुष्ट भाव मुझे बेहद आकर्षित करता रहा. अपनी बहन के प्रति भी उनकी जिम्मेदारी के साथ साथ स्नेह भरी समझ देखते ही बनती थी. मगर उनकी ऐसी खुद्दार इमानदार सेवाभावी तबीयत के कारण हरिमति के ससुराल वालों को रिझाते रिझाते वह अमीर जमींदार से गरीब और लाचार बनते हैं. फिर वही सामाजिक दृश्य देखने को मिलता है जहां जात पात धर्मं में बंधे नीलाम्बर अपना जीवन निर्वाह करने के लिए काज आसानी से नहीं ढूंढ पाते. नीलाम्बर आखिरकार कीर्तन गान करके चार पैसे कमाने लगता है. बिराज एक सम्पन्न घर की बहु से एक गरीब दुखियारी स्त्री में परिवर्तित होती है जो किसी तरह रोटी का इन्तेजाम करती है अपने कुशल हाथों से मिटटी के साचे बनाकर. यूँही साल बीतते हैं और उन दोनों की परिस्थितियाँ बिगडती ही रहती हैं. 


बिराज निःसंतान है. मालुम होता है की इस वजह से भी वे गाव में लोगों के बीच रहेते हुए भी बिराज की अपनी जिंदगी के रंग बोहोत फीके पड़ने लगे हैं. रूपवान होने की वजह से किसी बुरे अमीर आदमी की बुरी नजर उसपर पड़ती है. उसे पाने की चाह में नदी पर एक घांट बनाकर वह बिराज के घर के इर्द गिर्द ही मंडराता है. नीलाम्बर की निरंतर गरीबी और हाताशी देखकर मैंने स्वयं क्रोध और निराशा महेसूस की, फिर बिराज जैसी सुन्दर अहंकारी पतिव्रता के मन पर क्या गुजरती है यह समझना मेरे लिए स्वाभाविक था. एक और बढती गरीबी तो दूसरी और तनाव घर के भीतर और घर के बाहर भी. 


एक काली रात में नीलाम्बर अपने स्वभाव के विपरीत जाकर बिराज पर शक कर बैठते हैं. जबकि वह बेचारी तीन दिन से भूखी, बुखार में जलने के बावजूद, अपने आत्मसन्मान पर गहरा घांव करके किसी गरीब से भीख में मिले चावल पकाकर उनकी राह देख रही होती है. इसी झगडे मार पीट से कहानी पर काली छाया पड जाती है. बिराज घर से निकाले जाने पर आत्महत्या से भी घोर समझा जाने वाला पाप कर बैठती है. अपने चाहने वाले के पास जाती तो है फिर तुरंत खुदकी भूल जान लेती है और नदी में कूद जाती है. उसकी जान बचती है मगर वह रोगी हो जाती है, धीरे धीरे अंधी और अपाहिज बनती है. अपने पाप में जल रही वह लम्बे अरसे तक घर लौटने का साहस नहीं करती. वहीँ नीलाम्बर अपनी अर्धांगिनी से जुदाई पर जैसे अपना आधा जीवही खो बैठते हैं. मरने से पहले बिराज गाँव लौटती है और पति के बाहों में प्राण त्यागती है. अपने पति और परिवार की क्षमा, प्यार और इज्जत पाकर ही वह सांस छोडती है. 


इतनी रुलाई के बाद मेरे लिए यह एक 'हैप्पी एंडिंग' ही रहा.




Sunday, January 8, 2012

नौका डूबी –रविन्द्रनाथ टगोर

मैंने इस साल हिंदी प्रवास की शुरुवात की रविंद्रनाथ टगोर की इस कहानी के भाषांतर को पढके.

कहानी है रमेश, कमला, हेम्नालिनी, और नलिनाक्ष की. उन विन्हीन्ना पात्रों  को जान्ने के लिए लेखक ने खूब समय दिया है और कहानी की गति उन्ही पात्रों की धीमेसे बहेती हुई जीवन की नदी की तरह है. साथ ही अनेक विधाता रचित संयोगों में बंधी घटनाओं की वजह से इस उपन्यास में कुछ अनपेक्षित मोड़ आते हैं जो विशेष जान पड़े.

रमेश है पढ़ा लिखा वकील जो कोलकत्ता में एक छोटे से मकान में रहेता है. उसका पढ़ाकू, शांत चित्त एक ओर  है तो दूसरी ओर हैं उसके गरम मिजाजी दोस्त और पडोसी योगेन्द्र का रंगीन परिवार. योगेन्द्र के पिता नवीन बाबु ने उनकी बेटी हेम्नालिनी को भी अपने बेटे की तरह ही पाला है उन्ही अधिकारों और सुविधाओं के साथ. पत्नी के गुजर जाने के कारन वह हेम्नालिनी को पिता का प्यार और माँ की ममता दोनों ही देने का सदैव प्रयास करते हैं. उनके घर में हर शाम चाय की मेज पर खूब महफ़िल जमती है और आधुनिक विषयों पर चर्चा होती है. वहीँ हेम्नालिनी और रमेश के बीच में स्नेह बढ़ता है हालाकि योगेन्द्र के मित्र अक्षय को सदैव रमेश से जलन होती है.


इस प्रेम को बढ़ावा मिलने में आड़े आता है रमेश का सेहेमा हुआ, निष्क्रिय स्वभाव. इतने में गाव से पिता का बुलावा आने के कारण कहानी को कुछ अलाग ही मोड़ मिलता है. रमेश पिता के दिए हुए वचन के खातिर एक गरीब विदवा की बेटी से विवाह करने के लिए बड़ी विमुखता और निराशा के साथ परिवार सहित लड़की के गाँव जाता है. लौटते समय नदी में बहुत बड़ी बाढ़ आने के कारण परिवार वाले लगभग सभी लोगों की मौत होती है. उस समय नदी के घाट पर अपने पास बेहोश पड़ी अपनी बेसहारा पत्नी पर रमेश को दया आती है. पत्नी कमला के भोलेपन और निसंदेह भरोसे से मोहित होकर रमेश उसे अपने साथ कलकत्ते ले आता है मगर अपने दृढ निश्चय के बाद भी हेम्नालिनी को नहीं भुला पाता.


तब अचानक यह बात सामने आती है की बाढ़ में बहुत बड़ी हेरा फेरी हो गयी और असल में कमला रमेश की नहीं किसी नलिनाक्ष डॉक्टर की ब्याही पत्नी है. यह जानकार रमेश बहुत बड़ी दुविधा में पद जाता है, कमला से दूर दूर रहेने लगता है जबकि वह रमेश को ही अपना सर्वस्व मानती है. भाग्य के खेल को सर्व श्रेष्ठ दिखलाते हुए लेखक के इस कठोर मजाक के बाद अब आगे क्या होगा यह रहस्य उस लम्बी किताब की धीमी गति के बावजूद पाठक को बांधे रखता है.

कमला उम्र में छोटी अनपढ़ और भोली जरूर है मगर घर गृहस्ती का काम बेझिझक उठा लेती है. रमेश के ठीक विपरीत वह उत्त्साही सशक्त संकल्पों और मूल्यों के आधार पर अपने आप को हमेशा अपने आपको साधन सम्पन्न और सकारात्मक दर्शाती है. रमेश द्वारा बोर्डिंग स्कूल भेज दिए जाने पर पहले मन लगाकर पढ़ती है फिर अपने पतिप्रेम में व्याकुल होकर लौटने की तीव्र इच्छा प्रकट करती है और अपना अधिकार फिर से पा ही लेती है. कमला व्यवहारिक जीवन में अपने आप को सफल साबित करती है. कोलकत्ता के तानों से बचने के लिए रमेश द्वारा आयोजित काशी यात्रा पर चाचा और सेवक का भी आदर और स्नेह प्राप्त करके दिखाती है. परन्तु रमेश की दुविधा को समझने में कमजोर पड़ जाती है. उनके द्वेष को देखकर अपनी ही नजर में गिरती है और उम्र तथा अनुभव के अभाव में इस परिस्थिति का सामना नहीं कर पाती, मन ही मन जलती रहती है, व्याकुल, अस्थिर हो उठती है.


वहीँ हेम्नालिनी अपने भाग्य का सामना करते हुए खूब मनोबल और साहस प्रदर्शित करती है. रमेश अचानक गायब हो जाता है, खबर नहीं करता, फिर कोल्कता लौटता है पर किस्सी बात को ठीक स्पष्ट नहीं करता. अपनी कमजोरी के कारण हेम्नालिनी से भी कमला के बारे में साफ़ साफ़ नहीं कह पाता जबकि योगेन्द्र और अक्षय उसकी छिपाई हुई बात पकड़ लेते हैं और हेम्नालिनी के सामने रख देते हैं. इस सब के बावजूद हेम्नालिनी को अपने प्रेम पर विशवास है, रमेश को पहेचानने की अपनी क्षमता पर विशवास है और रमेश के बताए अर्ध सत्य के सहारे सब्र करना मंजूर है. अपने पिता नवीन बाबू के सहारे से वह अपने विशवास को सामाजिक दबाव से अधिक प्राधान्य देने में सफल होती है और उदासीन भाव से नवीन बाबु के साथ वह भी काशी निकल पड़ती है. 


अजीबोगरीब इस कहानी के अंतिम अंश में प्रवेश करते हैं नलिनाक्ष बाबु. बाढ़ में अपनी पत्नी को खो देने के शोक में डूबने के बाद और अनास्तक भाव से लोगों की सेवा में और डाक्टरी में लग जाते हैं. उन्हें अपनी बूढी मान की सेहत का, सेवा का बहुत ख्याल रहेता है. एक तरफ उनकी काशी घाट पर हेम्नालिनी से मुलाकात होती है और दोस्ती होती है. दूसरी तरफ अभागी दुखी कमला अपनी सचाई जान लेने के बाद गंगा में डूब जाने की इचा से निकलकर तैरती हुई, भटकती हुई, ठोकरें खाकर आखिर कार नलिनाक्ष बाबु की माँ की ही सेवा में उपश्तित हो जाती है. उसका भोला मन जितना मार्गदर्शन करता है उसके हिसाब से वह फिर जीवन को मन चाहे मार्ग पर लाने में इस तरह कुछ हद तक सफल होती है. रमेश उसे ढूंढते हुए वहीँ पहुँचता है और चारों पात्रों को अपना भाग्य काशी में ही मिलता है. 

काशी में ही कहानी का अंत है और मन में कई सावाल रह जाते हैं की क्या कमला को रमेश के साथ ही लौट कर जीवन बिताना चाहिए. क्या हेम्नालिनी को नलिनाक्ष से बनी दोस्ती को विवाह में बंधकर प्रेम में बदलने की कोशिश करनी चाहिए या रमेश के साथ पुनर्मिलन को एक और मौका देना चाहिए. असली जीवन की तरह ही कोई एक रास्ता सरल और स्पष्ट नहीं होता और दुविधा, मोह, माया, शंका में सदैव बंधे रहते हैं.


इसको पढने के बाद मैंने हाल ही में इस कहानी पर आधारित फिल्म भी देख डाली. कशमकश. मगर वह संक्षिप्त रूप सबके व्यक्तित्व को पकड़ने में बेहद असफल रहा और तब एहेसास हुआ की उपन्यास अपनी  उस्सी असह्य धीमी गति के कारण कितना रसमय और सुंदार सफ़र रहा. चित्रीकरण के इतने फायदे होते हुए भी सभी अक्सर कहते हैं के चित्रों का किताबों से टोल नहीं और मैं भी इसी निष्कर्ष पर पहुंची ...