Sunday, October 14, 2012

वूलाटन हौल की सैर




पिछले पोस्ट में हम नौटिंगहम स्टेशन से ट्रेन लेकर बीस्टन की ओर चल पड़े थे।

बीस्टन रेलवे स्टेशन छोटा सा प्यारा सा है। बाहर आकर सीधे चलते रहो तो पाँच मिनटों में ही 'हाय रोड' की चहल पहल में शामिल हुआ जा सकता है। दुकानें हैं, 'सपोर्ट हौल' हैं, मुख्य ग्रंथालय है, कुछ अच्छे रेस्टोरंट  हैं जैसे 'अमोरे', 'निम्बू' इत्यादि और घरों की बस्ती भी है। बीस्टन की सड़कों पर बड़े बूढों की भीड़ देखकर आपको बेहद ख़ुशी होगी क्योंकि आम तोर पर सड़कों पर लोग नहीं सिर्फ गाड़ियाँ ही नजर आती हैं। अक्सर विदेश में शायद 'एलियन' भी दिख जाए मगर घर से बाहर निकलते ही रास्ते में लोगों के दर्शन करना बेहद नामुमकिन होता है।

खैर आज तो दर्शन करने हैं वूलाटन हौल के जो नजदीकही में पड़ता है। गाडी चलाते हुए कुछ ही मिनटों में बीस्टन पार करके 'वूलाटन' इलाके के सौन्दर्य का मजा लीजिये। नौटिंगहम शहर का यह पश्चिमी हिस्सा है तथा वूलाटन गाँव कुछ सात्सो सालों से बसा हुआ है। ऐतिहासिक और खूबसूरत होने के कारण यहाँ के घर महंगे हैं, बेहद सुन्दर हैं और कुछ परिवारों की पीड़ियाँ उतनी ही पुरानी हैं जितना की वूलाटन हौल। यही वजह है की युवक और नौजवान अक्सर ट्रेंट नदी के पास 'वेस्ट ब्रिज्फोर्ड' के विक्टोरियन आलिशान घरों में रहना पसंद करते हैं जो शहर की टिमटिमाहट से नजदीक हैं, जबके वुलाटन के एलिजाबेथन घरों में बाल बच्चे वाले कुटुंब, व्यवसायी परिवार और विद्यार्थियों तक का मिश्रण है जो इस जगह को और मजेदार बनता है।


वूलाटन हौल के गेट से अन्दर चलिए और पार्किंग स्थान की तरफ 'ड्राइव' करते हुए बाएँ हाथ की तरफ नजर फेरिये। सामने दृशय इतना दुर्लभ और अद्भूत सुन्दर है जो एक क्षण के लिए क्षुब्ध कर दे। हौल की भव्यता और ख़ूबसूरती किसी राजवाड़े की याद दिलाती है। उससे भी जादा लुभाते हैं सामने सजे हुए बगीचे और हरे मैदान। बल्कि हौल के चारों ही तरफ कोसों दूर तक फैले इस हरे गलीचे को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। दाएं ओर नजर घुमाईयें तो हिरणों का झुण्ड दौड़ता हुआ दिखाई पड़ेगा। इन हिरणों के पास जाने पर भी यह नहीं कतराते। पीछे की ओर तालाब है शांत, शीतल, सुंदरसा। बुजुर्ग तालाब के पास टहलने आते हैं और बच्चे बाग़ में खेलने। यहाँ पर पालतू जानवरों के लिए बहुत सहानुभूति होने के कारण, कुत्ते बिल्लियों की भी वूलाटन हौल के बाग़ में खूब आबादी होती है। गर्मियों के दिनों में 'पिकनिक' होती हैं और संगीत के समारोह तथा अन्य उत्सव।

इंग्लेंड के यंत्रीकरण की सफलता के उदाहरण वूलाटन हौल के निचले हिस्से में प्रदर्शित होते हैं। पुराने 'स्टीम इंजन', पहले पहले बने टेलीफोन और सबसे ख़ास 'रेलेह सायकल' जो नौटिंगहम की ही पैदाइश हैं। इस तरह से एक तरफ हरियाली और प्राकृतिक सौन्दर्य को बनाए रखा गया है तो दूसरी तरफ प्रोत्साहित किया गया है  नौटिंगहम का छोटासा धड़कता व्यवसायिक क्षेत्र। अगले पोस्ट में चलेंगे उत्तर दिशा में नयूस्तेड एबी । फिर मिलेंगे।





Sunday, September 16, 2012

कुछ कुछ उल्टा पुल्टा सफ़र

                                           

कभी नदी की धारा उलटी दिशा में बहती देखी  है?  नौटिंघम वासियों को जीवन जल देने वाली विशाल नदी है 'रिवर ट्रेंट'। इस नदी का प्रवाह चलता है दक्षिण से उत्तर की ओर, अंत में वह 'नोर्थ सी' सागर में मिल जाती है।

नदी की धारा से जिंदगी की धारा है। 'ट्रेंट' नदी का यही असर है नौटिंघम के लोगों पर। सदियों से यहाँ बसे लोगों को ट्रेंट से पीने का पानी मिलता आ रहा है। दोसो साल पहले नदी पर बनाए गए 'नौटिंघम कनाल' के जरिये यहाँ की खानों से कोयला दूर दूर तक पहुंचाया जाता था। इन दिनों कनालों का आनंद पर्यटक उठाते हैं 'बोटिंग' के जरिये। कुछ जन्मदिवस मानाने क लिए दोस्तों के साथ नदी की सैर करते हैं तो कुछ अपनी शादी का जश्न करते हुए 'ट्रेंट रिवर क्रूज़' पर निकल पड़ते हैं। हर साल अगस्त के महीने में 'रिवरसाइड' त्यौहार मनाया जाता है। दिन में नदी के किनारे खाना पीना, मौज मस्ती और रात को खूबसूरत फाटकों की लाइटिंग से नदी को दुल्हन की तरह सजाते हैं। आकाश को छूने वाली सुन्दर आतिशबाजी देखते ही बनती है। नीचे ठंडी शीतल हवा में नदी का प्रवाह चलता ही रहता है और नदी की शीतल माया से जिंदगी।

नदी पर अलग अलग जगहों पर पंद्रह पुल बने हुए हैं। इनमें मुख्य है 'ट्रेंट ब्रिज' जो नौटिंघम शहर की ओर ले जाता है। 'ट्रेंट ब्रिज' के नाम से ही नदी के किनारे बना है बड़ा लोकप्रिय क्रिकेट ग्राउंड। औगस्त 2011 में 'ट्रेंट ब्रिज' पर  इंग्लेंड और भारत के बीच पचासवा टेस्ट मैच खेला गया मगर ये मत पूछिए की हम जीते या नहीं। यहाँ रहने वाले हिंदी भाषीय लोगों को यह पेचीदा सवाल भांता नहीं जो 'क्रिकेट टेस्ट' के नाम से ही जाना जाता है।

ट्रेंट नदी के पास ही है रेलवे स्टेशन। क्यों न यहाँ से एक ट्रेन लेकर सीधे बीस्टन चला जाए। शहर के बीचोबीच से शहर की सरहद पर। बीस्टन से चलेंगे वोलाटन जो नौटिंघम का पश्चिमी हिस्सा है, फिर उत्तर में आर्नोल्ड और अंततः पूरभ में कार्लटन का हिन्दू मंदिर। याने नदी की तरह नीचे से ऊपर, पश्चिम से पूरभ - थोडा सा उल्टा पुल्टा।

                             

Sunday, August 19, 2012

नॉटिंगहम में महात्मा गांधीजी - सन 1931

                                                            

नॉटिंगहम के 'ओल्ड मार्केट स्कवेर' में है 'काउन्सिल बिल्डिंग' अर्थात यहाँ का मुख्य सरकारी दफ्तर। जनता की सुविधा, व्यवसाय के प्रबंध, शहर चलाने की व्यवस्था के सभी काम कुछ हद तक काउन्सिल के हाथ में होते हैं। उदाहरण के तौर पर गरीबों के लिए सस्ते या मुफ्त घरों का आयोजन करना, दुकानों और कारोबारों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी और उपयुक्त हालातों का प्रयोजन करना, सरकारी पाठशालाएँ चलाना, यातायात के प्रबंध, समय पर कचरा जमा करना, लोगों से टेकस वसूल करना इत्यादि।

शहर की सजावट करती है कौंसिल, सार्वजनिक त्योहारों को मानाने का आयोजन करती है। शहर को सुन्दर रखने में एवं समाज को मिलजुलकर सकारात्मक रचनात्मक कार्यों में जुटाने का जिम्मा है काउन्सिल पर।
यह संभव होता है क्योंकि सर्व साधारण लोग अपने घर की तरह पास पड़ोस के इलाके को भी अपना ही समझकर शान्ति और सफाई का ख्याल रखते हैं। नॉटिंगहम के मूल निवासी ज्यादातर आपस में मित्रता और प्रेमभाव बनाए रखते हैं, समय आने पर एक दूसरे की सहायता करते हैं और सदैव देशप्रेम का भाव जताते हैं। चाहे ओलिम्पिक्स के मैदान पर हो या 'चैरिटी' के क्षेत्र में। जरुरत पड़ने पर श्रम दान करते हैं और दिल खोलकर पैसे/चंदा भी देते हैं।

तब शायद अचरज की बात नहीं की 'कौंसिल बिल्डिंग' के अन्दर महात्मा गाँधीजी का पुतला है। गांधीजी के अहिंसक सत्याग्रह से भारत को आजादी मिली मगर उनके जो राजनीतिक एवं सामाजिक बदलाव के सन्दर्भ में उपदेश थे उनका पालन एक तरह से यहीं पर देखने को मिलता है। यहाँ सरकार का अत्याधिक काम जनता के हित में होता है, भ्रष्टाचार न के बराबर होता है। इसके अलावा गांधीजी आजाद भारत में सेंकडों आत्मनिर्भर संप्रदायों का निर्माण होते देखना चाहते थे। अर्थव्यवस्था भी ऐसी चाहते थे जिसमें हर नागरिक आत्मनिर्भरता और आत्मसन्मान से जीने का अवसर पा सके। वे चाहते थे की हर मनुष्य ऐसे अवसरों का लाभ पाकर, उच्च सामाजिक मूल्यों को सराहे, व्यक्तिगत रूप से उदारता, सहानुभूतिशीलता और सच्चाई की राह पर चले।

इस हफ्ते 15 अगस्त के अवसर पर राष्ट्रिय झंडा फहराया गया, नॉटिंगहम में भी। भारत में आज कहीं निराशा है यही देखकर की अभी देश में गांधीजी के सभी सपनें साकार नहीं हुए हैं। किन्तु जो भारतीय मूल के लोग नॉटिंगहम में रहते हैं उनको काउन्सिल बिल्डिंग में सजी गांधीजी की मूर्ती प्रतिदिन आशा और साहस दिलाती है और कुछ अच्छी सीख नॉटिंगहम-वासियों से भी मिलती हैं। इसीलिए कोशिश जारी है लोगों की अच्छाई पर गोर करते हुए अपने आप में सकारात्मक परिवर्तन करने की। आखिर जब हर व्यक्ति में बदलाव होगा तभी तो समाज में बदलाव होगा।


काउन्सिल बिल्डिंग का भव्य रूप और 'मार्केट स्क्वर' सा खुला सुन्दर स्थान प्रतिदिन लोगों को पुलकित करता है। पास ही में 'मेड मरियन वे' पर प्रसिध 'इन्डियन रेस्तौरांट' है '4,500 माईलस फ्रॉम दिल्ली' नामक। ऐसा महसूस होता है इन्ही विचारों की राह पर चलते रहो तो शायद दिल्ली इतनी दूर नहीं। इंग्लेंड की तरह भारत में भी शायद जल्द ही ऐसे सुन्दर शहर देखने को मिलेंगे। आशा तो यही है।



     



Sunday, July 15, 2012

नॉटिंघम है मेरा गाम!




कुछ लोग नॉटिंगहम को 'रॉबिन हूड कंट्री' के नाम से जानते हैं।

ऐतिहासिक कथाओं और लोक गीतों में रॉबिन हूड को गरीबों का मसीहा बताया जाता है। वह गरीब बेबस लोगों को न्याय दिलवाने के लिए चतुरता से अपने शूर वीर साथियों के साथ नॉटिंगहम राज्य के शासक 'शेरिफ' से लढता था, शेरिफ से मिले हुए लालची साहूकारों एवं ढोंगी पुरोहितों से धन छीनकर गरीबों में बाँट देता था। रॉबिन हूड के साहस और निडर उदारता से मोहित होकर शादी के लिए आखिर राजी हो जाती है गाँव की सबसे सुन्दर सुशील युवती 'मेड मरियन'



यह 'बॉलीवुड गाथा' एक वजह है की नॉटिंगहम प्यारा सा अनोखा सा लगता है। करीब नौ शतकों से बसे हुए इस शहर के ईंट और पत्थरों में कई पुरातन कहानियाँ हैं, सदियों से चले आते हुए परिवारों की अपनी सभ्यता है। इस वजह से भी मनोहर मालूम होता है नॉटिंगहम; सुन्दर इमारतें और हरियाली से आकर्षण होता ही है मगर इस इतिहास से मानवीय एहेसास होता है।

कपटी शेरिफ रहता था एक पथरीले किले में और यह ' नॉटिंगहम कासल' आज भी सैलानियों को आकर्षित करता है। जब मरियन को शेरिफ ने यहाँ बंदी बनाकर रखा तब साहसी रॉबिन हूड ने सेकड़ों सिपाहियों से लड़कर उसे छुड़ा लिया। आज की तारीख में, किले की तरफ  खुफियां रास्ते से जाना हो तो रॉबिन हूड की तरह गुहाओं का इस्तमाल कीजिये। मगर सीधे रास्ते से जाना हो तो 'ओल्ड मार्केट स्कवेर' से एक बड़ी सड़क पार कीजिए और उस पार है कासल। स्वाभाविक है की इस एहेम सड़क का नाम रखा है 'मेड मरियन वे'.

'ओल्ड मार्केट स्कवेर' नॉटिंगहम का केंद्र है जैसे यूरोप के देशों में अक्सर शहरों के बीच का मध्य भाग सबसे एहेम केंद्र बिंदु होता है। कुछ हद तक जादुई लगता है यह 'ओल्ड मार्केट स्कवेर' जब जाड़े के मौसम में यहाँ 'क्रिसमस मार्केट' सजता है। टिमटिमाती लाइटिंग, गुड्डियों के घरों जैसे सजी मोहक दुकानें, गरम मसालेदार 'ग्लू वाइन' और चटपटे खानों की महक। बारहवे शतक से यहाँ बाजार लगता था जहां आम जनता व्यापार करती, अन्न वस्त्र उपलब्ध करती। बस्ती धीरे धीरे बढती गयी और आज नॉटिंगहम शहर इंग्लैंड में एक बड़ा शहर माना जाता है। अगले कुछ ब्लॉग पोस्ट्स में दर्शन होगा नॉटिंगहम के अन्य सुन्दर आकर्षणों का जिनमें छिपी हैं कथाएँ मजेदार।

                       


Sunday, June 10, 2012

नमक का दरोगा - मुंशप्रेमचंद

प्रेमचंदजी ने दर्शाया है की नेक इरादों का अंजाम अच्छा ही होता है.  एक नौजवान जब नौकरी की तलाश करता है तो पिता अपनी जिंदगी के तजुर्बे से नसीहत देते हैं. कहते हैं ऐसी नौकरी ढूंढना जिसमे उपरकी आमदनी अधिक से अधिक हो. आखिर महीने की तनख्वा में घर गृहस्ती के खर्चे चलाने होते हैं. कुछ अपनी इच्छाएँ पूरी करनी हो तो ऊपर की आमदनी आवश्यक हो जाती है.

आज्ञाकारी बेटे ने नमक विभाग में नौकरी तो हासिल कर ली मगर झूट की राह पर चलना उसे कुछ रास न आया. बल्कि बेटे ने कुशलता से व्यव्हार करके एवं अच्छे बर्ताव द्वारा नाम कमा लिया.  एक दिन उसका पाला गाँव के बहुत बड़े व्यापारी से पड़ा जो अक्सार घूसखोरी का सहारा लेकर अपना काम करवाता था. मगर नए दारोगा थे इमानदार लाख समझाने पर भी माने नहीं और परिणाम स्वरुप उनपर कचहरी का झूठाही मामला दर्ज हो गया. नौकरी भी चली गयी. पिता, पत्नी सभी लड़के की इमानदारी का फल देखकर उसपर नाराज थे माताजी भी अपनी यात्रा की कामनाएँ पूरी नहीं कर पा रही थी.

लेकिन एक सप्ताह बाद अचानक व्यापारी स्वयंही पूर्व दारोगा के द्वार पर आ खड़े हुए. उनके मन में लड़के की कठोर धर्मनिष्ठा के प्रति आदर जाग उठा. वह अपना सौभाग्य समझने लगे थे की इसे व्यक्ति से उनकी गाँठ पड़ी और उसीको व्यप्पारी ने अपना मनेजर बनाने की ठान ली. पूरे आदर के साथ उन्हूने दारोगा को अच्छी तनख्वा देकर नौकरी पर रखा.

अच्छी नीयत से किये कर्त्तव्य का फल कुछ देर बाद ही सही लेकिन मीठा ही मिलता है.


Sunday, May 6, 2012

मोटारामजी शास्त्री - मुंशी प्रेमचंद

मोटारामजी विद्यावान शिक्षक थे एवं धन के अभाव में चिन्त्रग्रस्त थे। उन्होंने उपाय खोजा गलत रास्ते पर चलने का। धूर्तता से वैद बनकर लोगों को ठगने की योजना बनाते हुए वे पत्नी को स्पष्ट करते हैं की इस मार्ग से  बहुत धन मिलेगा और खतरा भी न होगा। नकली आयुर्वेदिक दवाइयों में घास पूस मिलाकर किसी की मौत न होगी परंतु जब रोगी अपने आप दो चार दिनों में ठीक होजाए तो उनकी वैदिकी के गुण गाएगा। इस प्रकार लाभ  होंगे पर नुक्सान कभी नहीं यही कहते हुए मोटारामजी ने अपनी बुद्धि का बखान पत्नी के सामने किया।

अर्थात उन्होंने अखबारों में झूठे इश्तेहार दिए और विदेशी लोगों से झूठे प्रमाण पत्रों का भी विज्ञापन किया। कुछ अरसे तक अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करते रहे और सफल नामी वैद्य बन गए। मगर कहानी का अंजाम अपेक्षा के अनुसार बुरा ही हुआ। उनकी बनी बनाई ग्रहस्ती और प्रतिष्ठा एक ही शाम में चकना चूर हो गयी जब एक अमीर महीला की मर्हम्मद करने के ढोंग में वे रंगे हाथों पकडे गए। मुश्टणदोन ने उनकी खूब पिटाई करके उन्हें लखनऊ से हमेशा के लिए विदा कर दिया।

पंडितजी धाम से जमीन पर आ गिरे और प्रेमचंदजी ने इस प्रकार फिर एक बार सरल एवं महत्वपूर्ण सीख एक छोटी सी कहानी के जरिये दे डाली।  

Sunday, April 8, 2012

प्रेरणा - मुंशी प्रेमचंद

प्रेमचंदजी की सुन्दर लघुकथाओं में से यह एक श्रेष्ठ कथा है। एक  शिक्षक किस तरह भौतिक जीवन से दूर जाकर विद्या देने की प्रक्रिया में अपने मूल्यों की खोज करते हैं। वहीँ दूसरी ओर उनकी कक्षा का सबसे शैतान बच्चा  सूर्यप्रकाश  जिम्मेदारी का बोज सरपर पड़ते ही अपनी इज्जत और जिंदगी को संवारने में कामयाब हो जाता है।

पाठशाला के नियमों का उल्लंघन करने मे तथा शिक्षकों को उल्टा डराने में सूर्यप्रकाश माहेर था। मगर जब उसका छोटा ममेरा भाई मोहन साथ रहने लगा तो भाई के भरोसे ने सूर्यप्रकाश के चाल चलन में आसानी से परिवर्तन कर दिखलाया। उसके निःसन्देह प्रेम और आदर से सूर्यप्रकाश मजबूर होता है। शैतानी बंद कर सुलझे हुए जिम्मेदार आदर्शों का पालन करने लगता है। पढ़ लिखकर कलेक्टर बन जाता है और जिंदगी के एक मोड़ पर अपने उसी पुराने शिक्षक के समक्ष एक छोटे से गाँव में खड़ा होता है, फिर मुलाकात पुरानी यादों को ताजा करती है। किन्तु इस बदलाव में एक शिकार होता है उसका छोटा भाई जो सूर्यप्रकाश को रिझाने के मक्साद में अत्याधिक श्रम उठाकर बीमारी में चल बस्ता है। अपनी आहुति से सूर्यप्रकाश को संवारता है।

दूसरी ओर शिक्षक राह में आए उप्युक्तियों से खूब उन्नति करते हैं और नाम कमाते हैं। परन्तु सामाजिक कार्यों में अक्सर अछे से अच्छे लोग राजनीति और छाल कपट का शिकार होते हैं। योग्यता के बावजूद भाग्य साथ नहीं देता। ऐसी ही निराशाजनक परिस्थितियों एवं पत्नी की मौत के कारण वे सब कुछ छोड़ कर उसी गाँव में पढ़ाना शुरू करते हैं। गाँव के मासूम बच्चों को पढ़ाकर, नैसर्गिक सौंदर्य की आड़ में दुबारा सुख शान्ति अनुभव करते हैं। अबकी बार जब उनकी सूर्यप्रकाश से मुलाकात होती हिया तब दोनों की विचार धरा और जीवन मूल्यों में ठीक विपरीत फर्क आ गया है। सूर्यप्रकाश सामाजिक मूल्यों और रीतियों के अनुशासन को जान गया है वहीँ शिक्षक व्यक्तिगत आजादी और स्वतन्त्र विचारों का महत्व भी अनुभव से पहचान गए हैं।

अयोग्य शिक्षकों के चलते शिक्षा प्रणाली पर बड़ा बुरा असर पड़ता है। इस विषय पर भी कुछ अमूल्य मायने प्रेमचंदजी ने स्पष्ट किये हैं।